पंडित ने मांगे थे मुझसे,
पहली सैलरी मे से दश प्रतिशत दान मे देना मुझे,
उस दिन मा ने बड़ी चिंता के साथ हाथ दिखाया था मेरा पंडित को।
वो समाज सुधारक ने बोला था मुझे,
आप जैसे पढ़े लिखे लोग ही समाज को आगे ला सकते है,
समाज का आप पे बड़ा उपकार है,
अपनी पहली सैलरी समाज मे अर्पित कर देना।
मेरे सगे सम्बंधी ने भी मेरी पढाई के वक़्त,
दस रुपए वाली चीज़े बीस मे बेची थी मुझे,
फिर बोला था हमने बड़े काम किये है तुम्हारे
अब हमारा इलाज मुफ्त मे करना और कर्ज़ चुकाना हमारा।
मेरी बहन के गुरुदेव भी चाहते थे,
मे पहली सैलरी उनके चरणो मे समर्पित करू,
कभी पढाई के टेंशन के वक़्त हौसला बढ़ाया था उन्होंने,
वो पैसे भी दिन दुखी लोगो के ही काम आयेंगे पता है मुझे।
मेरी बुआ ये चाहती हैं मे खूब फलु आगे बढू,
कभी बंगला बनाऊँ तो रहने के लिए बुलाऊ,
कभी गाडि लूँ तो उन्हे कभी घुमा लाऊ,
बस मेरी बुआ ने ज्यादा देखा नही इतना सा ही चाहती है।
बच गए सिर्फ मेरे पिताजी,
उन्होंने कभी कुछ नही मांगा,
उन्होंने कहा था तेरी सैलरी है,
तुझे जो अच्छा लगे वो करना ।।
मेरी बुआ और पिता जी दो ऐसे लोग थे जो चाहते थे मे खुश रहूँ बाकी उन्हे कुछ नही चाहिए मेरी सैलरी से।।।।