पैड पौधें भी सुख गए अब हरे कैसे हो,
मै पैग़म्बर तो नही अब पहले जैसा कैसे हो,
दिल के हर जरें पर तस्वीर पर महोब्बत उनकी हो,
नूर वफ़ाओं के हो तो जुदा होने को वजूद कैसे हो,
आँखों नूर के सामने से दूर जाना नही है किसीको,
ए दिल अब जान गए है वो खुदा है तो जुदा कैसे हो,
उम्र आधी सही उजालों मे कटी हर सांस तक ,
तो अंधेरे मे दिल ना जलाए तो जिया कैसे हो,
जिसे दो वक़्त मिलने को तरसे हर रोज यह बात पर,
आज मुद्दत ए बजार मे आँखे मिले तो गिले कैसे हो,
दूरी ने दुरिया इतनी बनाली लाजमी इश्क़ के चक्कर मे,
उस शक्ष ने ये भी नही कहा पहचान कर तुम अब कैसे हो,
निगाहें पलके उठा कर देखती रही खुदा ए दिल भी परेशान है,
शहजादी को ये भी चहेरा मालूम है की नही ये पता मुझे कैसे हो,
DEAR ZINDAGI 💕