उस दिन तुम बात करना चाहती थी
पर शब्दों का अभाव था,
उस दिन तुम शरमायी थी
और बहुत देरतक चुप थी,
जो पत्र तुम्हें लिखा
उसका संदर्भ नहीं था,
उसमें ठंडी सड़क थी
विद्यालय था
छात्रावास के चारदीवारी थी,
मिलने का दिन
और समय का आभास था,
चाय और खाने की बात नहीं थी
शायद पूरी जिन्दगी थी।
* महेश रौतेला