सुबह 5 बजे जब प्रकृति के बीच होता हूं तो जान पड़ता है कि कितना ही अकेला हूं मैं इस संसार में, घास से उठती हुई रात की गंध एहसास कराती है कि नींद कहीं छूट गई है मेरी और मैं थका देने आ पहुंचा हूं अपनी देह को, मैं अर्धशैय्या पर मौन पड़ा पृथ्वी को जागते देखता हूं...!!!