आदत
तुमने खबर ही कहां ली मेरी
मेरे साथ रहते हुए भी...
बस मान लिया कि
ठीक ही" होगी"
तुमने पुछा ही कहां कुछ मुझसे
बस मेरी ख़ामोशी को समझ लिया
मेरी "हां "ही होगी
मैं ज़रूरी ही कहां थी उतनी
जितना मैंने खुद को तुम्हारी जिंदगी में समझ लिया
मैंने तो बस सोच लिया कि मैं तो बस
तुम्हारी जिंदगी में कुछ "खास "होऊंगी
मैं स्वीकार ही कहां पाई कुछ सच
बस पाले रही वहम
कि खूशी ऐसी ही होती होगी
बस ये जो "मानने"
और "होने" के बीच का फर्क होता है न!
उसे स्वीकारने में
एक उम्र साथ बीता देते हैं ये लोग
और पता ही नहीं चलता कि कब एक दूसरे की आदत बन गए!!!