काश! मे डूब पाता तेरे आँखों के समुंदर मे,
कुछ ना कुछ तो ढूंढ ही लाता समुंदर से।
जो ना मिले है हम तुझसे, कई सालों से ,
बंजर बन जाओगे,जो पूछो हिसाब इन सालों का ।
शब्दो की पीड़ा शब्दो तक ही रहे,
यह कहा का उसूल है,
कविता जब निखरती है एहसासो से,
तब कविता बन पाती है।
कलम को कहा पता,प्यार कैसा होता है,
यह जो दिल है, रोकर गवाई लिखवा देता है।
अब अकेला हु, तो बहुत खुश हु यारो,
वक्त मिल रहा अपने आप को जानने का।
बाकी लोगो ने तो बहुत,
ठगा है मेरी जिंदगी को।
फिर एक बार जी करता है टूट जाने को।
भरत (राज)