कभी दमकता था
चेहरा हमारा
जवानी के दिन थे
गजब था नजारा
मस्ती के आलम में
झूमते थे हर दम
फोटो थी ब्लैक एंड व्हाइट
चेहरा था भोला भाला
कमाल का दौर आया
दौर ए बुढ़ापा
चेहरे पर वक्त ने
मोहरें लगा दीं
रंगीन कैमरों ने
की बहुत कोशिश
लगता है मगर, है मात खाई
कुदरत के आगे रहा
किसका बोलबाला?
हर एक अंग ने
फिर साथ छोड़ा बारी बारी
आंखें फिर घुटने और
फिर दांतों ने गिरने की
कर ली तयारी
मिलता था बाजार में हर अंग, लेकिन
अस्ल नकल में था फर्क भारी
कहाँ मानव कहाँ कुदरत
पर संग्राम तो है यूगों से जारी
दिल जिगर गुर्दे जो सालों चले थे
वो भी करने लगे तंग बारी बारी
चारागर सारे लगे कोशिशों में
दवाओं दुआओं का
था प्रयास जारी
पर कुदरत के आगे
सब बेअसर थे
वक्त आखरी फिर
न चला जोर कोई
धरी की धरी रह गई
सब की सब तयारी
आर पी मल्होत्रा