कहते हैं,
प्यार में इंसान क्या से क्या
बन जाता है।
कामयाब मोहब्बत इंसान को क्या बनाती है?
प्यार की बारिश में
भीगा हुआ व्यक्ति
जिसे उसका प्यार हासिल हो
वो दुनिया का सबसे खुशनसीब
इंसान बन जाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
अपनी मोहब्बत को संजोए
रखने की खातिर
वफादार बन जाता है।
अपने आंगन इश्क़ की सौगात
खिलाता एक माली बन जाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
दुनिया की नज़रों से
अपने इश्क़ को छुपाता
पहरेदार बन जाता है।
हर कसौटी पर
खरा उतरता हुआ
एक ज़िम्मेदार बन जाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
नाकाम मोहब्बत क्या बनाती है?
प्यार के शहद को
चखने वाला वो इंसान
जिसका इश्क़ मुकम्मल
ना हुआ हो,
वो एक ही ज़िंदगी में
कई क़िरदार जीता है।
कभी शायर बन,
अपने अधूरे प्रेम को लिखता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
कभी पागल बन
बेवफाई के किस्से सुनाता है।
कभी तरक्की की सीढ़ी
चढ़ कर नाकाम मोहब्बत को
उसकी हैसियत दिखाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
कभी वैरागी बन
संसार एक मायाजाल है
ये समझाता है।
कभी नादानी में
टूटा हुआ दिल फिर
किसी से लगाकर
एतबार का सबक सबको सिखाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
ज़िंदगी में इश्क़ की बाज़ी
हारा हुआ इंसान
कभी कभी मौत को भी गले लगाता है।
इश्क़ कमज़ोर दिलों के
बस की बात नहीं
ये नसीहत बिन मांगे दे जाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष
बदलवाता है।
बेहिसाब हो जाए गर
ये किसी को
तो उसे अपने आशिक़
का तलबगार बनाता है।
कुछ होते हैं दीवाने
जिन्हें दूर रह कर मोहब्बत
करने की सज़ा मिला करती है,
दूरियों के बावजूद जिनकी
नीयत में खोट नहीं आती
ऐसे आशिकों को ही
वो ऊपरवाला अपना बनाता है।
ये इश्क़ है साहब!
ना जाने कितने भेष बदलवाता है।