छलकते नयन तेरी अंतर्मन की पीड़ा कह जाते,
तू लाख छुपा अपनी मुस्कान कायम रख,
गालों पर ठहरे आँसू अनकही दास्ताँ कह जाते।
दामन में उल्लास-उमंग भर ले तू,
पलकों पर बिखरे सपने समेटकर,
फिर भी भींगी पलकें अपनी दर्द बयाँ कर जाते।
टपकते नमकीन आँसू जख्म को गहरे कर,
मोहब्बत चाहत के रंग को धुंधले कर जाते।
लाख बचाना चाहा दामन अपना ,
पर अश्क प्रेम के ठहर नहीं पाते।
मन के पीर होते गए गहरे,
वक्त भी कितना सितमगर निकला,
हिय में दर्द-नम आँखें दे, मुस्कान चुराने लग गया।
सुख-दुःख के इन लम्हों के बीच,
आखिरकार उम्र का चांद ढल ही गया।
* अर्चना सिंह जया,गाजियाबाद उत्तर प्रदेश