शायद मुक्ति मिले
ज़माने की कई आँखों से में
ख़ुद को बचते बचाते आया हूँ
तुम्हारी बाहो में तुम्हारें भीतर
शायद यहाँ सब दुःखो का अंत हो
नई आत्मा में मन प्रवेश करे
मेरा एकांतवास तुम्हारी बाहों में
पूर्ण'विराम ले
इन्हें मौक्ष मिले बंधन मुक्त हो,
निक राजपूत -