बचपन
न कुछ पाने की इच्छा, न कुछ खोने का डर ,
इस भागदौड़ भरी जिंदगी के बदले, काश मुझे मिल जाए दोबारा वह सुनहरा बचपन।
जी वही बचपन जिसमें माँ के आंचल में था सुकून,
बहुत कुछ कर गुजरने का सर पर होता था जुनून।
बहुत याद आती है वह सुधार वाली माँ की मार,
उस मार से बचाती मेरी दादी करती थी, जो मुझे बहुत दुलार।
ऊपर से कठोर पर दिल भीतर बहुत सारा प्यार,
मेरे बिन बोले ही पूरी कर देना मेरी हर फरमाइश, कुछ ऐसा ही था मेरे पापा का प्यार।
स्कूल में दोस्तों संग मिल बांटकर खाते थे खाना,
अब तो दोस्तों से मिले ही हो गया है एक जमाना।
बरसात के पानी में तैरती थी वो कागज की हमारी कश्ती,
बहुत खुश होते थे, करके ऐसी ही ढेरों मस्ती।
मेरे चेहरे को देखते ही समझ जाती थी मेरी हर परेशानी,
मैंने तो हमेशा अपने हर सवाल का जवाब अपनी माँ ही जानी।
जीवन की परेशानियों से सच बचपन के दिन भले थे,
माना कि कुछ बंदिशे थी,
लेकिन यकीन मानो हम बच्चे ही अच्छे थे।
काश फिर से माँ का वो आंचल मिल जाए,
काश फिर एक बार वह सुकून भरा बचपन लौटा जाए।