बदलते मौसमों के ख़यालात का मसला है
सुनो मोहब्बत तो जज़्बात का मसला है
कोई रोया था आशिक़ तमाम रात कहीं
लोगों को लगा कि बरसात का मसला है
तेरे छोड़ आने से फ़ूल अब ख़िलते नहीं
वजह तुम हो या फ़िर बाग़ात का मसला है।
बदल जाती है वक़्त के साथ चाहतें भी
तुमको लगता ये बस जात का मसला है
याद आ जाता है ग़म ख़ुश्मिज़ाजो को भी
दोष शराबों में है या ख़राबात का मसला है
मुझे नींद आती नहीं और चैन भी खो जाता है
यार ये नहीं बस इक रात का मसला है।
ग़म बताएँ किसे अपना कोई मिलता नहीं
मेरे साथ साज़िश-ए-हालात का मसला है
और हो जाएँगी दूर तमाम गलतफहमियां भी
तुमसे बस इक मुलाक़ात का मसला है