पीठ
बात उस समय की है जब आदमी गुफाओं में रहता था तथा सभी जीव जन्तु घने जंगलों में रहते थे सब कुछ ठीक चल रहा था। परन्तु एक दिन जंगल में जानवरों ने किसी बात पर नाराज होकर घोड़े को पीट दिया। उसकी किसी ने नहीं सुनी और वह अकेला पड गया।
घोड़े ने सोचा कि मैं आदमी के पास जाकर अपनी समस्या बताता हूं तो वह सब से सुलह करा देगा। वह सरपट जंगल से दौड़ता हुआ गुफा के पास पहुँचा तथा आदमी को आवाज देकर गुफा के बाहर बुलाया तथा आदमी को अपनी व्यथा बताई। घोड़े ने आग्रह किया कि वह जंगल में जाकर सभी जानवरों को समझा दें। आदमी बोला पर मैं जंगल में जाऊंगा कैसे? घोड़े ने कहा मेरी पीठ पर सवार होकर चलो, आदमी घोड़े पर सवार होकर बैठ गया तथा घोड़ा सरपट जंगल पहुँच गया। वहाँ जाकर आदमी ने जानवरों को समझाया कि आपस में नहीं लड़ते हैं घोड़ा खुश हुआ तथा आदमी को वापस गुफा छोड़ने के लिए ज्यादा तेजी से पहुंचा।
अब तक आदमी ने ऐसी सवारी ना की थी और ना ही सोची थी। घोड़े ने गुफा पहुँचकर आदमी को अपनी पीठ से उतरने के लिये कहा। परन्तु आदमी घोड़े के पीठ से उतरा ही नहीं तथा जब उतरा तो घोड़े को गुफा के बाहर ही बाँध दिया।
रस्सी से बंधा घोड़ा समझ चुका था कि कितनी भी परेशानी आये कभी किसी को अपनी पीठ पर सवार नहीं होने देना चाहिए।
डॉ० आर० बी० सिंह, उ० प्र० राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय के बरेली के क्षेत्रीय समन्वयक है।