बीवी, मैं और मेरी कल्पना.. 😝
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बीवी कहती है,
कि कभी,
कुछ तो काम करा करो,
यूँही ठाली बैठे रहते हो बस..
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अब, उस पगली से क्या कहूँ,
कि, कल की ही बात हैं ,
जब मैं, चांद पर,
उसी की, चाँदनी के साथ,
टहलने चल दिया..
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और उससे पहले, जब,
स्कूटर से, दफ़्तर को निकला, तो जैसे,
मैं राकेट मे बैठा, नील आर्मस्ट्रांग था..
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और दोपहर में, जब अक्सर लोग,
ए. सी. ना चलने से परेशान होते है,
तो मैं, एवरेस्ट पर घूमते हुए,
कड़कड़ाती ठंड मे,
दांत पीस रहा होता हूं..
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कभीं - कभीं लोग,
जब पसीने से बेहाल होते हैं,
तो, मैं, ख़ुद को,
झमाझम बारिश मे,
भीगा हुआ पाता हूं ..
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और तो और, जब मेट्रो में,
लोग भीड़ से, परेशान होते हैं,
तो मैं ख़ुद को, अकेला पाता हूं..
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अक्सर, मैं,
कल्पना, के साथ भी होता हूँ,
पर, य़ह बीवी को पता नहीं है ..
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मैं, रातों - रात,
अपनी कल्पना का हाथ थामे,
जाने कितनी ही, किताबें पढ़ डालता हूँ..
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आज, सुबह की ही तो बात हैं...
जब मैं, चाय की चुस्कियों के दरमियाँ ही,
नील गगन छू आया..
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और दांत माँजते हुए,
मैं जब, अपनी कल्पना के,
समंदर में गोते लगा ही रहा था,
तो बीवी ने, य़ह कहते हुए डूबने से बचाया,
कि, कहा डूबे हुए हो प्रभू,
कुछ तो, काम कर लिया करो,
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मन किया लिख दिया..!!