व सृष्टिः क्व च संहारःक्क साध्यं क च साधनम् ।
व साधकः क सिद्धिा स्वस्वरूपेऽहमद्रये ॥
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क प्रमाता प्रमाण वाक प्रमेयंक च प्रमा।
क किञ्चित्क न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे ॥
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यो ध्रुवाणि परित्यज्य ह्यध्रुवं परिसेवते। ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति चाध्रुवं नष्टमेव तत् ॥
//जो निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का सहारा लेता है, उसका निश्चित भी नष्ट हो जाता है ।अनिश्चित तो स्वयं नष्ट होता ही है //
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