साई
बेचैन है, बेकरार है बच्चे सारे, नर-नारी, और वृध्द-वृद्धा
साई, संकट में है सिख तुम्हारी, खुट रही है सबुरी और श्रद्धा
प्रश्न अनेक और अनगिनत है, कैसे सुल्ज़ाउ यह उल्ज़न, मैं साई ?
खोल दे, मेरे दिलो- दिमागक के द्वार, देख शरण तेरे, मैं हु आइ ।
Armin Dutia Motashaw