🔱🕉️श्री हनुमान चालीसा संध्याकाल संध्या वंदन मंगलवार ब्रह्मदत्त 🕉️🔱
(जय श्री राम
॥दोहा॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥
बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहि हरहु कलेस विकार ॥
ॐॐ॥चौपाई॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥
राम दूत अतुलित बल धामा ।अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥
महावीर विक्रम बजरङ्गी ।कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥
कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।कानन कुण्डल कुचित केसा ॥४॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥५॥
सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥
विद्यावान गुनी अति चातुर ।राम काज करिबे को आतुर ॥७॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा ।विकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे ।रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥
लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥ ११ ॥
रघुपति कीही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ १२ ॥
सहस बदन तुह्मारी जस गावैं ।अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥
जम कबेर दिगपाल जहाँ ते ।कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।राम मिलाय राज पद दीहा ॥ १६॥
तुहारी मन्त्र विभीषन माना ।लगेस्वर भए सब जग जाना ॥ १७॥
जुग सहस्र जोजन पर भानु ।लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥
दुर्गम काज जगत के जेते ।सुगम अनुग्रह तुहारे तेते ॥२०॥
राम दुआरे तुम रखवारे ।होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥
सब सुख लहै तुह्यारी सरना ।तुम रच्छक काहू को डर ना ॥ २२ ॥
आपन तेज सह्यारो आपै ।तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥ भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।महाबीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥
नासै रोग हरै सब पीरा।जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥ सङ्कटतें हनुमान छुड़ावै ।मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥
सब पर राम तपस्थी राजा ।तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥
और मनोरथ जो कोई लावै ।सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥
चारों जुग परताप तुह्मारा।है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ २९ ॥
साधु सन्त के तुम रखवारे ।असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥
राम रसायन तुह्मरे पासा ।सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥ तुहारे भजन राम को पावै ।जनम जनम के दुख बिसराये ॥३३॥
अन्त काल रघुबर पुर जाई ।जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥
और देवता चित्त न धरई ।हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥३५॥ सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं ।कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥
जो सत बार पाठ कर कोई ।छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा ।होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा ।कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥ ॥दोहा॥
पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसह सर धूप ॥
प्रस्तुतकर्ता ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ एवं समस्त श्री राम, हनुमान, शनिदेव, भक्त