धुंध केवल धुंध दिखती ,रास्ते मगरूर से हैं
यूँ ही बैठे हम घरों में, आसमानों की खबर ले
क्या बताएं स्वयं को ,हम भला यूँ दूर क्यूँ हैं ?
हर दिशा पर आज पहरे ,हम ही उसके दोषी ठहरे
किन्तु न समझेंगे जब तक ,खुद ही हम न जाएँ गहरे
आज तन्हाई का मंज़र, हर हृदय बेनूर क्यूँ हैं ?
डॉ .प्रणव भारती