पल दो पल का है सवाल
ईतना भी तू मशरूफ न हो, के अपनोके लिए तेरे पास एक पल भी न हो
ऐसा न हो, जब सिधारेंगे वो स्वर्ग तब तुझे उनके लिए रोनेकी भी फुरसत न हो ।
जो रिश्तोंको एहमियत न दे, प्यार और सन्मान न दे, वो बहुत पछताता है ।
जो तुम्हारा अपना है, उसे थोडासा अपनापन दो, तुम्हारी एक कीमती पल दो
उसके दुखमे सांत्वना दो, बस पलभर हाथ थाम लो ।
पैसों का नाम आते ही रिश्तेदार और दोस्त, डर जाते हैं,
पैसे भले मत दो, सिर्फ दो हिम्मतभरी बातें तो करो ।
साथ निभाओ, जब साथकी जरूरत हो, इतना भि मशरूफ मत रहो।
Armin Dutia Motashaw