Hindi Quote in Poem by महेश रौतेला

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पिता जी उम्र के उस पड़ाव पर :

पिता जी बैठे रहते थे
उम्र के उस पड़ाव पर
चिलम पीते थे,
एक गम्भीर सोच के साथ
धुआं उड़ाते थे।
चाय को घूंट-घूंट पी
गिलास लुढ़का देते थे
जैसे स्नेह के अहसास लुढ़कते हैं।
आडू,खुमानी, नारंगी खाते थे,
पहाड़ पर उतरी धूप को देख
सटीक समय बता
विद्यालय जाने को कहते थे।
पिता जी अन्न की महिमा बता
अन्नग्रहण करते थे,
यदाकदा खेतों को झांक
जीजिविषा में प्राण भर
ऊँचाई पर स्वयं चढ़ने को बोलते थे।
जाड़ों में अंगीठी जला
अंगारों को देख,
खुश हो जाते थे।
उनकी खांसी
निडर बनाती थी,
लाठी की खट-खट
आश्वस्त करती थी।
अंकगणित के प्रश्नों पर
अपनी बुद्धि खोल,
हमारे सामने रख देते थे,
हम सहमे-सिमटे से
इधर-उधर देख जी चुराते थे।
पिता जी बसंत,बर्षा, गरमी
शरद, हेमन्त,शिशिर स्वयं बन
हमें आगे उतारते थे।

* महेश रौतेला

Hindi Poem by महेश रौतेला : 111796455
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