आज किसी अंजान से मिली ,
मै कही न दिखी ,
अपनेपन का भ्रम ही था,
शायद ! पहले भी |
सोच रही हूँ आखिर !
क्या ऐसा अपराध किया था ,
जिन्दगी ने जो मजाक किया |
तुम अन्दर बैठे तो हो!
मिली तो तुमसे ही थी न ?
नही हो , नही हूँ , तो क्यों खाली बर्तन
से नेह दिया |
रचना 01 Apr 2022 टूटना