एक त्रिशंकु सिलसिला
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बेतरतीब सी उम्र
न जाने किस तलाश में
भटककर रह गई
एक सिलसिला बेतरतीबी का
तरतीबवार चलता रहा
तमाम उम्र
इस मोड़ से उस मोड़ तक
उस मोड़ से अंतहीन रास्तों तक
जूझते हुए
भटकते हुए
सिमटते हुए
बेतरतीब उम्र का वो तरतीबवार सिलसिला
आज भी भटक रहा है
लटक रहा है !!
डॉ . प्रणव भारती