स्वार्थी क्षण
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किसकी बात करते हो ---और
चढ़ाते हो प्र्त्यंचा /जिसका निशाना गलत है |
खौफ़नाक सफ़ेदी के सामने
गिलगिलाते वाक्य बोलते हो ,
खींचते हो एक नीरव श्वांस व्यर्थ ही --और
पुचकारते हो ,अपने भीतर की
बेहयाई को--आख़िर
किस मुँह से बात करते हो
निस्वार्थता की ?
कौनसे अक्षर से मिलाकर
बनाया है तुमने स्नेह ?और
चारों तरफ़ बून डाला है एक जाल
जिसे तोड़ने के लिए
बहेलियों ने भर लिए हैं अपने तरकश --और
दी है टँकोर प्रत्यंचा को !
क्या कुछ फ़र्क नज़र आता है ?
क्या कुछ सर्द नज़र आता है ?
मौसम गुलाबी था --ख़ुश्क हो गया है ---और
परत दर परत मुस्कुराहट
सूखी बीमारी में बदलकर /कंकाल हो गई है |
क्या ये वही घड़ी है ,
जिसकी तुम्हें
प्रतीक्षा थी ?????
डॉ . प्राणव भारती