हाँ ! करती हूँ प्रेम बहुत ,
नही फर्क दूरियों से ,
कर देती है और भी नजदीक यह दूरियाँ भी|
मगर! फिर भी अन्दर से बाहर जब नजरे घूमती है ,
संन्नाटे भयभीत करते है तभी खमोशी के बीच एक तड़फ उठती है , उस सन्नाटे के सांय सांय मे तुम्हारी बासुरी सी मधुर आवाज जो हृदय की पीड़ा आभाव सब सोख लेती है | और मन प्रयास मे जुट जाता है |तभी स्मरण होता है , तुम्हारे शब्द ,शब्दाग्रह और तुम्हारा यूँ ही बदल जाना | सोचती हूँ क्या यह सन्नाटा तुम्हारे भीतर भी है जिसमे तलाश करते हो तुम मेरी | यदि हाँ तो क्यों है सन्नाटा मेरे मेरे भीतर | 29/03/2022 प्रतीक्षा