कुछ शब्द कानो मे घुलकर
हृदय तक पहुँचे थे ,
जैसे तुमने अन्दर किसी को जगाया हो,
वो एक - एक शब्द ,शब्दों की लड़ियाँ विश्वास
का आधार बनती गई | उसी लड़ी के धागे मे मैने
खुद को पिरो लिया | जाने क्यों तुम रोज एक एक मोती
उसमे से निकाल रहे हो खुद के दिये विश्वास को खुद ही
मार रहे हो ,मगर फिर विचार आता है शायद तुम मुझे आजमा रहे हो , मुझे ठोक पीटकर कुछ बना रहे हो|
हृदय मे तुमसे तनिक भी दूरी नही , वहाँ तुम्हे कोई स्पर्श भी नही कर सकता मेरे अलावा , किसी को देखने तक की इजाज़त नही , हर क्षण तुमसे ही तो बतियाती हूँ , तुम्हे अपने करीब पाती हूँ , सब कुछ तुम्हे ही तो सौपा है जो तुम्हारा ही था , बस उसमे होने का दोष तुम्हारे चरणों मे रख आई हूँ | सब कुछ तुम्हारा है गुण- दोष, भेद तुम ही जानो बुध्दि,चित, मन सब मे तुम्हारा पसासा है| विश्वास और अविश्वास की लाठी मुझपर मत चलाना | चलाओगे तो दर्द खुद ही पाओगे मै तो तुम्हारी आँखों से देख रही हूँ,तुम्हारे कानो से सुनती हूँ ,तुम्हारी बुध्दि से सोचती हूँ ,
तुम्हारे मन से भाव करती हूँ , इनसब से उत्पन्न विचार तुम्हारे है |
सबकुछ तुम्हारा तुम ही जानो 🙏