उर के सब संताप मिटे।
जैसे ही मिले प्रिय से हिय सारे।
अंग से अंग मिले सबके।
रंग उमंग के संग बिखारे।
भाव प्रभाव स्वभाव सभी से।
भरि के कर से रस पान करा रहे।
लाल गुलाल से गाल गुलाल।
गुलाल भए सबके मन भा रहे।
देखि बयार दिशा बिसरी सब।
घूमत है सब वृक्ष उघारे।
होली हुई है धन्य हुए हम।
आगंतुक स्वयं आप पधारे।
आनंद त्रिपाठी। ( लेखक )