गिर रहे हैं शाखों से पत्ते फिर
कि शज़र भी सुनसान हुआ है
बदलते मौसम के साथ
उम्मीद्दों का पौधा भी वीरान हुआ है
वसंत क्या गया और पतझड़ क्या आया
संगीत तो दोनों में ही है
एक मधुर लगे तो दूसरा नहीं भाया
एक में कोयल कूके
एक में सन्नाटा बेशुमार हुआ है
गिर रहे हैं शाखों से पत्ते फिर
कि शज़र भी सुनसान हुआ है
-अनुभूति अनिता पाठक