मन।
मन किसी की बीच संबंध बनाता है।
और किसी के बीच संबंध तोड़ता है।
मन।
मन कही चंचल है।
तो कही शांत है।
मन।
मन कही सीमित है। तो कही असीमित है।
मन।
मन कही दशा है। और कही पर दुर्दशा है।
मन।
मन कही मौन है। कही पर अतिशय क्रोध है।
मन।
मन कभी यहां है कभी वहां है।
मन।
कभी मुस्कराया तो कभी रुलाया।
मन।
मन कभी संबल है तो कभी निर्बल है।
मन।
कभी अहसास है। तो कभी उदास है।
मन।
कभी जिंदगी है। तो कभी मौत है।
मन।
कहीं मोह है। तो कही विछोह है।
मन।
कभी मन है। तो कभी नहीं।
मन।
कभी ब्रम्हांड में तो कभी अंड में है।
मन।
कभी सत्य में है। तो कभी झूठ में है मन।
मन।
मन वेदांत है। तो कभी सिद्धांत है।
मन आस है तो मन कभी विश्वास है।
मन रस है। तो कभी मन नीरस है।
कभी मन हास है तो कभी उल्लास है।
कभी अशक्त है। तो कभी ये भक्त है।
मन।
कभी अज्ञान है तो कभी सज्ञान है।
कभी विचलित तो कभी स्थिर है।
मन।
कभी माया से परे है। तो कभी माया में परे है।
कभी सम्मान करता है। तो कभी अपमान में है।
मन।
कभी खुल है तो कभी बंद हो जाता है।
मन।
कभी ये मन पापी है। तो कभी शुद्ध साफी है।
मन।
मन मौन होकर भी कितना प्रबल है।
और मनुष्य अमोन्न होकर भी कितना निर्बल है।
आनंद त्रिपाठी।
सुखन वर