काशी में भगवान विश्वनाथ ने दी श्रीरामचरितमानस को मान्यता!!!!!!
इसके बाद तुलसीदासजी भगवान की आज्ञा से काशी चले आए और वहां भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को उन्होंने श्रीरामचरितमानस सुनाया । रात को पुस्तक श्रीविश्वनाथजी के मन्दिर में रख दी गयी । सवेरे जब मन्दिर के पट खोले गए तो उस पर लिखा पाया गया—‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ और नीचे भगवान की सही थी । मन्दिर में उपस्थित लोगों ने ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की आवाज भी सुनी । देवताओं ने जय-जयकार करते हुए फूल बरसाए और तुलसीदासजी को वरदान दिए ।
श्रीरामचरितमानस के प्रथम श्रोता!!!!!!
गोस्वामीजी ने श्रीरामचरितमानस को सबसे पहले संत श्रीरूपारण स्वामीजी को सुनाया जो मिथिला में रहते थे और भगवान श्रीराम को अपना जामाता मानकर प्रेम करते थे । इसके बाद भगवान ने तुलसीदासजी को काशी में रहने की आज्ञा दी ।
श्रीराम-लक्ष्मण ने की रामचरितमानस की पहरेदारी!!!!!!
श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्धि से काशी के संस्कृत विद्वानों को बड़ी ईर्ष्या व चिन्ता होने लगी । वे दल बनाकर गोस्वामीजी की पुस्तक को ही नष्ट करने की कोशिश करने लगे । उन्होंने पुस्तक चुराने के लिए दो चोर भेजे । चोरों ने देखा कि गोस्वामीजी की कुटी के बाहर श्याम और गौर वर्ण के दो वीर बालक पहरा दे रहे हैं । रात भर बड़ी सावधानी से उन्हें पहरा देते देखकर चोर बहुत प्रभावित हुए और श्रीराम व लक्ष्मण के दर्शन से उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी । उन्होंने तुलसीदासजी के पास जाकर पूछा कि तुम्हारे ये पहरेदार कौन हैं? तुलसीदासजी ने गद्गद् कण्ठ से कहा कि तुम लोग धन्य हो जो तुम्हें भगवान के दर्शन प्राप्त हुए । गोस्वामीजी समझ गए कि मेरे कारण प्रभु को कष्ट उठाना पड़ता है इसलिए उनके पास जो कुछ भी था, वह सब लुटा दिया ।