याद है तुम्हें ...वो लम्हे जब हम पहली बार मिले ,
हम खिल उठे ऐसे - जैसे गुलशन में हों गुल खिले ।
ओस की बूँद जैसे चमक उठती है सूरज को पाकर ,
मैं भी खिल उठी वैसे ही तुम - सा हमराही पाकर ।
तुझ बिन मेरे जीवन का हर एक ख़्वाब अधूरा है ,
तुम संग मैं इठलाती तितली जिसका जहां ये सारा है ।
तुझे यूँ ही निहारती रहूँ , ये समाँ बस यहीं थम जाए ,
तेरे रंग में ऐसे रँग जाऊँ कि वो रंग फिर उतर ना पाए ।