कैसा उद्वेलन !!
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संबंधों से संबोधन तक
कैसा यह परिवर्तन
साँझ घिरे ही अकुला जाते
यह कैसा उद्वेलन !
निखरी-निखरी काया सबकी ,उजाले-उजले मुखड़े
साँसों की गति चुगली खाती ,कितने-उखड़े-उखड़े
प्राणों में बस जाती हलचल
यह कैसा संवेदन !!
साँझ घिरे ही -----
दिशा-दिशा में फैले आँचल ,ख़ुशबू की आहट में
पल-पल कितनी मजबूरी है ,हर गहर की चौखट में
उजियारे की बात पुरानी
दिन अंधियारा आँगन !!
साँझ घिरे ही ---
शब्दों के घर में बैठी थी ,सँवरी सी एक शबनम
देख अकेली बीहड़ आया ,बनकर उसकी सौतन
टूटी माला ,बिखरे मोती
जी भर रोई दुलहिन ----
साँझ घिरे ही -------
डॉ. प्रणव भारती