शीर्षक: हाल-बेहाल
बड़ा शौक था, जिंदगी तुझे सजाने का
फिजा को रास नहीं आया ऐसा करने का
दयार ए बहार में कुछ ऐसा घुल आया
हर रंग तेरा फीका पड़ने को हो आया
ये कैसा सितम है बदलते मौसम प्यार का
साँसों को डर है बिखर कर तार तार होने का
खुदगर्ज हुई नियत न समझे मतलब एतबार का
नब्ज क्या बिगड़ी ? नज़रिया बदला गया यार का
शिद्दत से बढ़ता रोग दे रहा दूर रहने का अहसास
प्यार का जलवा भी भूल गया आलिंगन का विश्वास
नाजुक सा दर्द कर रहा बेहाल, प्यार हुआ फटेहाल
तन्हा हुआ दिल देख रहा खुद का हुआ हाल- बेहाल
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali