चौराहे पर खड़ा हूँ मैं जाऊँ किधर
रास्ते चार हैं पर कहाँ मेरा घर।
धूप सिर पर आ गयी है कब से
जबकि अपने लोग अपना शहर।
गुरेज इस बात का नहीं कि
कोई दोस्त न बनाये हमने।
दुख इस बात है कि
दुश्मन भी नहीं अपने।
बड़ी तरकीब से अब तक काटी जिंदगी हमने
न हुआ शोर कोई कभी किसी महकमें में
पाटता रहा उम्र भर
जो खोदी थी खांई हमने।
तुम निकले इधर से
तो तुम्हें याद आया मकां मेरा
रास्ता भूले वास्ता भूले
आखिरी तक तुम्हें याद रहा जफ़ा मेरा।
मुझे ज़रा सा भी गम नहीं रुख़सत होने का
यहाँ कोई मेरा नहीं कम्बख्त रोने का
सफर तो चलने का नाम है"अर्जुन"
अब वक़्त है गहरी नींद में सोने का।