एक दिन मैं भी
मिट्टी में गड़ जाऊँगा
पीला पत्ता हूँ
जाने कब झड़ जाऊँगा
जब बहारें फिजां में
रवानी पे थीं
सबकी नजरें भी
सबकी कहानी पे थीं
आ गया इस जहां में मैं
ये सोचकर
अपनी तकदीर खुद ही मैं
गढ़ जाऊँगा
पीला पत्ता हूँ
जाने कब झड़ जाऊँगा ..
सोचा तो ये था कि
कुछ मैं कर जाऊँगा
बनके ऊँचा फलक
जग पे छा जाऊँगा
ना ये जाना कि
मुश्किल यहाँ है बड़ी
हर कदम पर है
आफत यहाँ पर खड़ी
हौसलों ने मुझे
हरदम समझाया है
पाठ जीवन के कुछ
मैं भी पढ़ जाऊँगा
पीला पत्ता हूँ
जाने कब झड़ जाऊँगा ...
खुद को माँजा बहुत
लाख हिकमत किए
कुछ बता पाएं जो
ऐसा ना कुछ किए
चाँद तारों की बातें
सब करने लगे
हम तो खुद से ही
खुद यूँ ही डरने लगे
जोश ना जाने गायब
हुआ है किधर
ख्वाब देखे थे क्या
रह गया बस सिफर
यह सिफर लेकर
आगे मैं बढ़ जाऊँगा
पीला पत्ता हूँ
जाने कब झड़ जाऊँगा ...