जाम हाथों में रहा है और लब पर बस धुआँ,
है यही उल्फ़त का तोहफ़ा मैं ग़ज़ल कहने लगा।"
उसकी आँखों में जो देखा मैं ग़ज़ल कहने लगा।
उसके बारे में जो सोचा मैं ग़ज़ल कहने लगा।।
नाम उसके कर दिए सब ख़्वाब भी ये नींद भी,
जब दिया उसने ही धोखा मैं ग़ज़ल कहने लगा।
चल दिया वो तोड़कर ये दिल खिलौनों की तरह,
मैनें भी उसको न रोका मैं ग़ज़ल कहने लगा।
आशना ग़म से न होता कैसे करता शायरी,
मिल गया संजय को मौका मैं ग़ज़ल कहने लगा।
©® संजय जैन