की मेरे गुनाह-ए-दोस्ती में मेरे लिए तेरा इस्तकबाल ही काफ़ी है,
मेरे चेहरे पर मुसकान के लिए एक तेरा नाम ही काफ़ी है,
तेरे रंग में रंगने से बढ़कर और क्या नशा होगा
नशे के लिए तो तेरा खुमार ही काफ़ी है,
और क्या ही माँगू तुझसे ए पालनहार
इन तरसि निगाहों को बस तेरा दीदार ही काफ़ी है।।
-श्रुति शर्मा