शीर्षक : दिलाशा
भूली हुई यादे और टूटते हुये ये ख्बाब
करते रहे, जिंदगी का हर लहजा बेनकाब
रहस्मय लगता, जिंदगी का अब हर अंदाज
तुम ही बताओ कैसे कर दूँ, इसे नजरअंदाज
चाह थी प्यार की, पर प्यार अब कहाँ मिलता ?
आजकल तो सुनते, जिस्म का हर हिस्सा बिकता
शिकायत नहीं करता, वो, ना सुनी सी ही रहती
दौर गति का है, इसलिए हवाओं में गुम हो जाती
किस्सा बन जाती, आजकल मोहबब्त की बातें
अधूरी चाहत की होती, तभी तो मिलन की राते
हाल मेरा अब मत कभी पूछना, अच्छा नहीं लगता
जानते हो तुम सब, खुश हो, सुनना ? खँजर लगता
"कमल" रस्मों की दुनिया में, सब जायज लगता
दिलाशा कौन देगा ? हर कोई यहाँ अब बीमार लगता
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali