रात जैसे
हमारे आधुनिक विचार
कहीं कोई रोशनी की झलक नहीं
संभावना से भरी माचिस की तीली भी
हमारे स्वार्थ के पानी से गीली हो चुकी
एक तो ये अंधेरा, ऊपर से न दिखने वाला सवेरा
घुटन और संत्रास का चारों तरफ गहन पहरा
सब कुछ अंदेशा यही दर्शा रहा
मानव नाम का प्राणी धीरे धीरे ओझल हो रहा
अस्तित्व हीन जीवन कहीं न कही जानवर बना रहा
सत्य की एक जब से मौत हुई, झूठ इतरा रहा
तुम क्या समझ रहे, मै क्या समझा रहा
दौर ही कुछ ऐसा, किसी के कुछ नहीं समझ आ रहा
रात जैसे जैसे काली हो रही, संतुलन ही गड़बड़ा रहा
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali