एकता और सम्मान
ताल के किनारे मंदिर और मस्जिद।
सूर्योदय पर मंदिर की छाया में मस्जिद,
सूर्यास्त पर मस्जिद की छाया में मंदिर,
सुबह एक के पहलू में दूसरा,
शाम को दूसरे के पहलू में पहला।
पूजा और इबादत,
आरती और अजान
प्रार्थना और नमाज
सभी थे साथ साथ।
एक दिन आई कही से
अफवाह की चिंगारी, धधका गई आग
भडका गई दंगा और फसाद
रक्त बहा मानव का
सिसक उठी मानवता।
मंदिर में ‘म’ और ‘द’
मस्जिद में भी ‘म’ और ‘द’
‘म’ और ‘द’ के मद ने
दोनो को भडकाया।
‘द’ और ‘म’ के दम ने
दोनो को लडवाया।
मद और दम में फंसकर
एकता हुई खंडित टूट गया भ्रातृ प्रेम
खोया सद्भाव और पनपे कटुता और क्लेश ।
किसी ने किसी का घर जलाया
किसी ने किसी का खून बहाया
किसी ने पति खोया
और कोई बेटे को खोकर
फूट फूट कर रोया।
अगर मद में आकर आदम
मदहोश नही हुआ होता
और झूठे दंभ में आकर
दम दिखलाने के लिये
न निकला होता
तो कोई बेघर नही होता
कोई अपना बेटा, पति या पिता नही खोता।
कायम रहता भाईचारा,
कायम रहती सांप्रदायिक एकता
और कायम रहता सद्भाव।
नही रूकती बस्ती की तरक्की
और नही झुकती सभ्यता की नजरें।
हम क्यों भूल जाते है कि -
हमारी एकता में ही छुपी है देश की एकता।
हमारी प्रगति में ही छुपी है देश की प्रगति और
हमारे सम्मान में ही छुपा है देश का सम्मान।