राजनीति के जनक और प्रणेता थे वे
जगत मात्र के विश्व विजेता थे वे
उनकी वाणी की गुहार
क्या पेशावर क्या म्यांमार
संसद भी उनका ऋणी सदा
वंदन करती उनको शब्दा
कविता की तुलसीदास थे वो
शब्दो के ब्रम्हास्त्र थे वो
वो करुणा के सागर भी थे
सत्ता उनकी भी कर्जदार
ऐसा था उनका प्रहार
अटल नाम और अटल बात
जो कहते थे वो करते थे
राष्ट्र भूमि पर मरते थे
अपनी कविता और शब्दो से वे अक्सर सब पर भारी थे। चिर काल परिश्रम रत होकर वे अपने अटल बिहारी थे।