थप्पड
कहते हैं थप्पड पड़े तो चोट के निशान रह जाती हैं
और निशान मिटाया तो जा सकता हैं पर निशान धुंधले से रह जाते हैं
अक्सर सुना हैं मैंने और देखा भी हैं निशान मिटाते हुए
एक पहेली सी हैं ये थप्पड़, क्यूं? अक्सर सवाल बन जाते हैं
मैंने वो हर एक इंसान से पूछा,पर जवाब मिला के किस्मत में यही हैं
दिल में एक दर्द सी हैं,बेचैनी सी हैं, काश कोई सुनने वाला होता
उलझने इतनी हैं के शायद में खुद को खोती जा रही हूं
दिल में कोई दस्तक दे तो घबरा सी जाती हूं में
प्यार के दो मीठे बोल बोले कोई तो घबराहट सी होती हैं
मेरी उलझने,मेरी परेशानी मेरी जिंदगी एक पहेली सी बन गई हैं
जिसे सही करना मेरे बस में नहीं
जिंदगी से कोई शिकायत नहीं पर खुद को खुद से शिकायत हैं मुझे
पैसे, रुतबे तो देखे हैं मैंने बस नही देखा तो चेहरा किसी का
जिंदगी अंधेर कमरे से कम नहीं ,और लोगो को मस्ती से फुरसत कहा
मैंने अक्सर देखा हैं हस्ते हुए रो पड़ना
और प्यार से कह देना आदत हैं हस्ते हुए रो पड़ने की
बहानों का सहारा लेना पड़ जाता हैं कभी कभी
और बेशक वो मज़े मे महफिल के लुफ्त उठाए जा रहे हैं
ये थप्पड़ ही तो हैं , जनाब जो दिल पर लगी हैं
जिसके निशान न दिखाई जा सकती हैं और न छुपाई जा सकती हैं
by
sarwat fatmi