तेरी यादों के तकिये पर मेरे आंसूओं की बुँदे सरक रही हैं
सर्दी की राते मेरी सहनशिलता परख रही हैं
लौट कर आजा परदेशी तेरे प्यार का हथोड़ा मेरी सहनशीलता तोड़े जा रहा हैं
इश्क़ का रथ अपने पहिये मोड़े जा रहा हैं बेदर्दी बेहया अपने जख्मी पैरो के निशा छोड़े जा रहा हैं
✍️ :- BD Vaishnav