मदिरा और मँहगाई
मँहगाई लगातार बढती जा रही है
और बढती जा रही है
मदिरा की खपत।
दोनो का नीतियों से है गहरा संबंध
दोनो का सत्ता से है
सीधा अनुबंध।
खोल दिये है
विदेशी कंपनियों के लिये
भारत के बाजार।
हो गई है -
विदेशी वस्तुओं की बाजार में भरमार।
बढा रही है उपभोक्तावाद को
लगातार सरकार।
बढता ही जा रहा है
जनता पर भार।
सभी को चाहिए
जीने के लिये अधिक कमाई।
इसी चक्र में फंसकर
बढ रही है मँहगाई।
उपभोगवादी प्रवृत्ति
बढा रही है सरकार का खर्चा।
सत्र खत्म हो जाता है
बिना किए कोई चर्चा।
मंत्री जी कमाई के लिए
बांट रहे परमीशन
अफसर और नेता मिलकर
खा रहे कमीशन।
प्रतिदिन होती है एक्सरसाइज
कमाई का सर्वोत्तम साधन है एक्ससाइज।
इसके लिए कदम कदम पर
खुल रहे है मदिरालय,
मदिरालय संरक्षित है पर
टूट रहे देवालय।
मँहगाई और मदिरा से
गृहलक्ष्मी है परेशान।
इस समस्या का कही भी
नजर नही आता है समाधान।
सरकार यदि करे नीतियाँ परिवर्तित
तो इन्हें भी किया जा सकता है नियंत्रित।
इसके सिवा नही है कोई विकल्प
इसके लिये शासन को ही
लेना होगा दृढ संकल्प।