शीर्षक: आज की व्यवस्था
मायूस सी निगाहें, लुटे-छितरे से बाल
हो सके तो लुटे इंसान, स्वयं को संभाल
आज कल गलियां सूनी, विश्वास की
नजरें भी खराब हुई, अब संसार की
अब पनाह नहीं देती, कोई भी हस्ती व दोस्ती
एक गलती, सौ इल्जामों को साथ लेकर चलती
कौन सच्चा, कौन झूठा, अब कोई नहीं कहता
दामन पाक हो, वो इंसान' बस्तियों में न बसता
हलाल हुई, बेहाल हुई सूरत, सहानुभूति न पाती
टेढ़ी हुई हर चाल, सीधी राह पर ही शिकार ढूंढती
वजूद तेरा न कर कमजोर, उठ खामोश न रह
हुआ जो तेरे साथ, कभी ऐसे समाज को न सह
अपने अंदर के साहस को पुकार, दे उसे नया आकार
व्यवस्था को चोट देगा, तभी तो न्याय करेगा, चीत्कार
✍️ कमल भंसाली