झुका हु हारा नहीं , शुरआत हु अंत नहीं ; कम्पित हु भयभीत नहीं , मैं विशाल सा सागर हु ,मोती सी बूंद समाई मुझमे ; लहरों सा उठा है तू किनारा पा कर लोटेगा हु मंजर में तबाही का सुनामी सा लेकिन कर्मो से शुभम हु ; मस्त हु मै अपनी गहराईयों में वही , जीत हु हार नहीं ; झुका हु हारा नहीं अपनी लेखनी से "शुभम मिश्रा "