*बादलों में अपना घर होता*
काँश बादलों में हमारा घर होता।
आलीशान महेलसे भी घर बड़ा होता
चाँद तारों से अपने घर को साझाता।
धरती के, शोर शराबें, भूलजाता।
अपनी नई दुनिया बादलों के ऊपर,
बनाता। सूरज की, किरणों से में,
घर मे दिप जलाता। चिड़िया कोयल,
से नन्हें दोस्त बनाता, लुका छूपी का।
खेल खेलतें हुए बादलों में कही छूप,
जाता। और बादलों से पूरी दुनियाको,
निहारता। तैरते हुए बादलों पर जुला।
जूलता। और सागर से थोड़ा पानी,
भरकर धरती, की प्यास, बुझाता।
*नीक राजपूत*
*गुजरात*