शीर्षक: मोहब्बत
कशिश जो मोहब्बत में कुछ कम होती
तो शायद जग में यों वो बदनाम न होती
न कोई गम की शाम, न तन्हा रात होती
वक्त की दास्तां में अंजामे जुदाई न होती
गुजर जाती रात, कुछ और ख्यालातों में
अंगूरी सपनों के आने की आहट न होती
बेसब्री में अपने जलवे कभी न बिखरेती
शमा के जलने से, परवाने की मौत न होती
मोहब्बत, आज भी दिल की अजीज मेहबूबा
बेताबियों के नग्मों में तन्हा हुई, हर दिलरुबा
कसमे वादों में सजी मोहब्बत की हर महफिल
पर कशिशे इश्क न जाने कहां उसकी मंजिल
आबरू ऐ मोहब्बत, जरा बतला दे तेरा एतबार
कहाँ, तू पाक दामन करती दीवाने का इंतजार
कल के सितम में न उलझे प्यार में आज के इरादे
खिले फूल सदा रहे, सब्ज हो, न टूटे किये हुए वादे
“दिलवर” मोहब्बत से बड़ी नहीं कोई दौलत
हर एक कि नेक, पाक दिल की जवां इबादत
खालिश दिल के गुलशन में रहे, शुहूद अमानत
काफिले प्यार के चले, योंही सफर करे “मोहब्बत”
✍️कमल भंसाली