खड़े है मुझको खरीदार देखने के लिए
मैं घर से निकला था बाज़ार देखने के लिए
हज़ार बार हज़ारों की सम्त देखते है
तरस गए तुझे इक बार देखने के लिए
क़तार में कई नाबीना लोग शामिल है
अमीरे-शहर का दरबार देखने के लिए
जगाए रखता हूँ सूरज को अपनी पलकों पर
जमीं को ख़्वाब से बे-दार देखने के लिए
अजीब शख़्स है लेता है जुगनुओं से ख़िराज
शबों को अपनी चमकदार देखने के लिए
हर-एक हर्फ़ से चिंगारियाँ निकलती है
कलेजा चाहिए अख़बार देखने के लिए
ख़िराज=किराया
डॉ राहत इंदौरी साहब