कहने सुनने के लिए अब कुछ रहा ही नही,
कितने पास थे तुम फिर क्यों लगा ही नही।
कसूर हमारा कहाँ था सोचते रहे सारी रात,
पागलपन का वो आलम फिर जँचा ही नही।
तुम्हे क्या लेना देना होता है किसी से कभी,
शीशे जैसा दिल देखो तुम्हारा पिघला ही नही।
लिखवाते हो कैसा कैसा हाथ पकड़ के तुम,
फिर खामोशी में कोई लब्ज़ रुकता ही नही।
दे के रखा है सब जान,इमान, अपनी रूह भी,
माँग लो अब तो तुम्हारे सिवा कुछ बचा ही नही।
अर्चना🌺