**अब चुप रहना नहीं है**
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( मुक्तछंद काव्य रचना )
चुप रहना है जिंदगी में तुझे ,
सब कुछ चुपचाप सहना है तुझे।
दिल की लगी आग में ऐॆसे ही,
पल-पल यहां जलना है तुझे ।
मन में उठें कई तुफानों को ,
ऐॆसे ही जिंदगी में झेलना है तुझे।
नारी बनके जो आयी हो तुम ,
संस्कृति के नाम पर ही चलना है तुझे।
बीत गये युग यहां कितने ,
फिर भी कौन समझा है यहां तुझे।
ज्ञानी हो या हो कोई भी अज्ञानी ,
सबने ही यहां दासी माना है तुझे ।
बहोत कम लोग हैं इस दुनियां में,
वो ही जानते है अपने दिल से तुझे।
तुम दासी नहीं,तुम भी स्वतंत्र नारी हो,
वो ही मानते हैं मन से अर्धांगिनी तुझे।
अब चुप रहना नहीं है जिंदगी में तुझे,
अब कुछ भी चुपचाप सहना नहीं है तुझे।
हर घर सुना है यहां तुम्हारे बिना ,
यही सबकुछ इस संसार को दिखाना है तुझे।
प्रा.गायकवाड विलास.
मिलिंद क.महा.लातूर.
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